मित्रों आप यदि मेरे नीचे दिए संदर्भ में ऊँचाई को उन्नति और सफलता के तुल्य लेंगे तो आप मेरे विचार को समझ पाएंगे जीवन में सफलता और उसके लिए आवश्यक तप, त्याग, परिश्रम, ललक के महत्व को और अधिक अच्छे से समझ सकेंगे।
[तपस् या तप का मूल अर्थ था प्रकाश अथवा प्रज्वलन जो सूर्य या अग्नि में स्पष्ट होता है। किंतु धीरे-धीरे उसका एक रूढ़ार्थ विकसित हो गया और किसी उद्देश्य विशेष की प्राप्ति अथवा आत्मिक और शारीरिक अनुशासन के लिए उठाए जानेवाले दैहिक कष्ट को तप कहा जाने लगा।
श्रम और परिश्रम में क्या अंतर होता है? श्रम करने वाले को श्रमिक कहा जाता है। श्रम के बदले में उसे मजदूरी मिलती है। परिश्रम निजी होता है यह अपने आप को किसी कार्य मे दक्ष बनाने और विद्या अध्ययन मे खर्च होने वाली ऊर्जा को परिश्रम कहा जाता है
ललक: प्रबल अभि— लाषा । गहरी चाह ।]
यदि ऊंचाई आपके भाग्य मे लिखी है तो वह आपको मिलेगी ही उसे कोई कम या ज्यादा नहीं कर सकता। वह ऊंचाई आपको कैसे मिलेगी यह कई बातों पर निर्भर होती है।
यदि हम एक पतंग और पताका की तुलना करें तो दोनो ही ऊंचाई तक पहुंचते हैं।
पताका कितनी ऊंचाई तक पहुंच सकती है और पतंग कितनी ऊंचाई तक पहुंच सकती है?
पताका उतनी ऊँचाई तक पंहुच सकती है जहांतक की उसमें लगा डंडा पहुंच सकता है और उस डंडे को थामे रख सके ऐसे व्यक्ति या आधार कि क्षमता होगी ।
पतंग किस ऊँचाई तक उड़ सकती है यह हवा, डोर और पतंग उड़ाने वाले की क्षमता पर निर्भर करता है।
पताका और पतंग दोनो ही स्वतः से ऊंचाई पर नहिं पहुंच सकते उनकी ऊंचाई कितनी होगी यह कुछ बातों पर निर्भर करता है ।
